तीज-त्योहार: शीतला षष्ठी व्रत से शीतल होता है मन, कुछ जगहों पर होली के बाद सप्तमी पर मनाया जाता है ये पर्व

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6 मिनट पहले

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  • इस दिन शीतला माता को बासी खाने का भोग लगाया जाता है और नीरोगी रहने की कामना से ये व्रत किया जाता है

माघ माह के शुक्लपक्ष की षष्ठी (छठी) तिथि को शीतला षष्ठी व्रत किया जाता है। इस बार शीतला षष्ठी का व्रत 17 फरवरी को यानी आज किया जाएगा। वहीं, कुछ जगहों पर ये व्रत होली के 6 दिन बाद यानी सप्तमी तिथि पर किया जाता है। इस दिन माता शीतला का विधिवत पूजन करना चाहिए। माना जाता है कि इस व्रत को करने से मन को शीतलता मिलती है।

इस दिन सुबह स्नान करके शीतला देवी की पूजा की जाती है। इसके बाद एक दिन पहले तैयार किए गए बासी खाने का भोग लगाया जाता है। इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है। इस व्रत को रखने से शीतला देवी खुश होती हैं। यह समय सर्द ऋतु के जाने का होता है। इस दिन व्रत और पूजन करके माता शीतला से रोग-विकार से मुक्ति की कामना की जाती है।

व्रत विधि
शीतला षष्ठी व्रत के दिन प्रातः जल्दी उठें और स्नान करने के पश्चात व्रत का संकल्प लें। उसके बाद लकड़ी के पटिये या चौकी पर सफेद वस्त्र बिछाएं और उस पर शीतला माता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पूजा करने के लिए स्वयं का आसन भी बिछाएं और शीतला माता का पूजन करें। शीतला माता का पूजन करते समय विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। आप चाहें तो किसी पुरोहित की सहायता लेकर भी पूजन कर सकते हैं।

ध्यान रखने वाली बातें
इस दिन यह ध्यान रखें कि गर्म खाद्य पदार्थ का सेवन भूलकर भी न करें। शीतला षष्ठी के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है। रात में ही सारा भोजन हलवा, गुलगुले, रेवड़ी आदि तैयार करके रख लेना चाहिए। इस दिन गर्म पानी से नहाने की भी मनाही है। इसलिए शीतला षष्ठी पर शीतल जल यानी ठंडे पानी से ही नहाना चाहिए।

व्रत का महत्व
संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाली स्त्रियों के लिए यह व्रत बहुत शुभ माना गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार शीतला षष्ठी व्रत को करने से दैहिक और दैविक ताप से मुक्ति मिलती है। इस व्रत के बारे में मान्यता है कि यह व्रत संतान प्रदान करने वाला और सौभाग्य प्रदान करने वाला है। शीतला षष्ठी का व्रत करने से चेचक रोग से भी बचाव होता है।

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