महिलाओं ने बदली गांव की तस्वीर: मणिपुर के कीरेम्बिखोक गांव की 80% महिलाएं फर्नीचर बना रहीं, कमाई बढ़ी तो बोर्डिंग स्कूल में कराए बच्चों के एडमिशन

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इंफालएक घंटा पहलेलेखक: एल नृपेश्वर शर्मा

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कीरेम्बिखोक गांव के सेलाइबाम जीबन बताते हैं कि गांव के एक व्यक्ति के हौसले ने पूरे गांव की तस्वीर बदल दी।

  • उन महिलाओं की कहानी जो आरी, रंदा और वसूला चलाकर बदल रही गांव की तस्वीर…

मणिपुर की राजधानी इंफाल से 32 किमी दूर बसा तोबल जिले का गांव- कीरेम्बिखोक। करीब 1500 की आबादी वाले इस गांव की खासियत यह है कि यहां की 80% महिलाएं कारपेंटर (बढ़ई) का काम करती हैं। यानी आरी, रंदा और वसूला चलाकर फर्नीचर से लेकर दरवाजे-चौखट तक बनाने का काम कर रही हैं। यह काम वे शिफ्ट में करती हैं।

यानी, घर के काम के बाद समय निकाल कर सुबह 7 से 11 बजे और दोपहर डेढ़ से पांच बजे तक। एवज में हर महीने 8 से 10 हजार रुपए तक कमा रही हैं। इस गांव की एक और पहचान है। यहां कोई बेरोजगार नहीं है। पति के साथ काम में हाथ बंटाने से परिवार की कमाई दोगुनी हो गई और गांव का हरेक सदस्य बच्चों को बेहतर भविष्य देने में जुट गया है। गांव का हर बच्चा स्कूल जाता है और गांव पूरी तरह नशामुक्त है। गांव की अहोमसांगबाम राधामणि बताती हैं कि 20 साल पहले मेरे पति ही कारपेंटरी का काम करते थे। उनकी अकेले की कमाई से घर का खर्च पूरा नहीं होता था। मुझे खेतों में भी काम नहीं मिला, इसलिए मैंने तय कर लिया कि फैक्ट्री में पति का हाथ बटाऊंगी। मैंने फैक्ट्री मालिक कांगजम इनाओबी से काम मांगा। उनके हामी भरते ही मैं इस काम में जुट गई।

हफ्तेभर के अंदर गांव की पांच-छह अन्य महिलाएं भी मेरे साथ काम करने लगीं और आज अधिकांश महिलाएं इसी काम में जुटी हुई हैं। गांव में हर हाथ को काम देने वाली फर्नीचर कंपनी के मालिक कांगजम कहते हैं- ‘मेरे लिए हैरानी की बात यह है कि महिलाओं ने इस काम को पुरुषों का ही काम नहीं समझा। पति के साथ कारपेंटरी के काम को सीखकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि वे भी पुरुषों के मुकाबले उन्नीस नहीं हैं। नतीजा यह निकला कि यहां का हरेक परिवार 20-30 हजार रुपए से ज्यादा कमा रहा है।’
हौसला: अपनी कमाई से ही स्व: सहायता समूह के कर्ज चुकाती है महिलाएं

कीरेम्बिखोक गांव के सेलाइबाम जीबन बताते हैं कि गांव के एक व्यक्ति के हौसले ने पूरे गांव की तस्वीर बदल दी। महिलाएं अब स्व सहायता समूह से लिए गए कर्ज को अपनी कमाई से ही चुकाती हैं। बच्चों को राजधानी के बोर्डिंग स्कूलों में शिक्षा दिलवा रही हैं। एक समय ऐसा भी था, जब वे बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भी भर्ती नहीं करवा पाती थीं।

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