महिला दिवस से आगे का सच: बड़े अफसर हों या जजों की ऊंची कुर्सी, इन पर महिलाएं दिखना मुश्किल; बोर्ड टॉप करने के बावजूद विदेश में पढ़ने का सपना अधूरा

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21 मिनट पहले

  • 45 बरस से हर साल महिला दिवस मना रहे हम, पर नहीं बदला जमीनी सच
  • टॉप नौकरशाही समेत सभी खास फील्ड में महिलाओं की नाममात्र मौजूदगी

बात 1975 की है। UN यानी यूनाइटेड नेशंस ने इंटरनेशनल विमेंस ईयर मनाते हुए पहली बार इंटरनेशनल विमेंस डे भी मनाया था। 2 बरस बाद 1977 में यूएन जनरल असेंबली ने सभी सदस्य देशों को बुलाकर 8 मार्च को महिला अधिकार और विश्व शांति के लिए यूएन डे घोषित किया।

उसके बाद से यह 45वीं बार है, जब भारत समेत पूरी दुनिया विमेंस डे मना रही है, लेकिन आज भी एक बड़ा सवाल मुंह बाए खड़ा है- आखिर साल में एक दिन विमेंस डे मना लेने भर से कुछ बदला भी है या यह सिर्फ रस्म अदायगी है। आंकड़े तो यही कहते हैं कि दुनियाभर में बदलाव जिस तेजी से होने चाहिए थे, वैसे हुए नहीं। भारत में तो महिलाओं के हालात और भी परेशान कर देने वाले हैं।

तमाम सरकारी और सामाजिक कोशिशों के बाद देश में पढ़ने वाली लड़कियों की संख्या तो बढ़ी, लेकिन इस पढ़ाई को उसी दर से करियर में बदलना महिलाओं के लिए अब भी दूर की कौड़ी है। जमीनी सच का अंदाज इस एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि, बोर्ड एग्जाम में टॉप करने वाली लड़कियों में 40% को विदेश जाकर पढ़ने का मौका मिलता है। लड़कों में यह दर 63% है।

आजादी के 73 साल बाद भी नौकरशाही हो या ज्युडिशरी, महिलाओं की नाममात्र मौजूदगी है। कुछ ऐसा ही हाल देश का सर्वोच्च भारत रत्न जैसे सम्मान और फिल्म फेयर जैसे बेहद मशहूर अवॉर्ड का है। इनमें भी महिलाओं के नाम नाममात्र ही दिखते हैं।

तो आइए जानते हैं कि भारत में महिलाओं के सच की बानगी…

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