संघर्ष से मिली सफलता: राजस्थान के ठंडी बेरी गांव की बसंती देवी, 13 साल की उम्र में हुई शादी, पति की मदद से की पढ़ाई, पिछले 20 सालों से टीचर बन कर बदल रहीं गांव की तकदीर

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42 मिनट पहले

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दक्षिण राजस्थान के जनजातीय क्षेत्र में 43 साल की बसंती देवी रहती हैं। वे अपने गांव में टीचर हैं। उनका बचपन गरीबी में बीता। माता-पिता के कम उम्र में गुजर जाने के बाद उनकी नानी ने सिरोही जिले के एक गांव में बसंती की परवरिश की। उन्होंने 5 वीं कक्षा तक पढ़ाई की और 13 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई। उसके बाद ठंडी बेरी गांव में वे अपने पति के साथ रहने लगीं जो सिरोही से लगभग 50 किमी दूर है। बसंती का पति हकमा राम खुद मैट्रिक पास है। वह चाहता था कि उसकी पत्नी भी आगे पढ़ाई करे।

शादी के कुछ सालों बाद सामाजिक कल्याण विभाग ने शिक्षाकर्मी योजना की शुरुआत की जिसके अंतर्गत 5 वीं कक्षा तक पढ़े-लिखे लोग जनजातीय इलाकों में शिक्षक पद के लिए आवेदन कर सकते हैं। बसंती ने भी इस पद के लिए आवेदन किया और वे अपने गांव में टीचर बन गईं। 2000 में उन्हें इस पद पर काम करते हुए 600 रुपए प्रतिमाह वेतन मिलने लगा। बसंती ने बताया कि जब सबसे पहले उन्हें वेतन मिला तो उन्होंने सारे पैसे अपनी सास को दे दिए। गरीबी के चलते बसंती की सास ने इतने पैसे कभी नहीं देखे थे। वह खुश हो गई। उसके बाद उसने कभी बसंती के पढ़ाने का विरोध नहीं किया।

गांव में बच्चों को पढ़ाने के साथ ही बसंती ने 8 वीं कक्षा की पढ़ाई शुरू की। उसके बाद स्टेट ओपन स्कूल से 10 वीं पास की। फिर पति की मदद से 12 वीं तक पढ़ाई की और एक प्रायवेट कॉलेज से बीए की डिग्री ली। उसके बाद एसटीसी की डिग्री ली। बसंती को इस बात की खुशी है कि गांव में पढ़ाई का माहौल तेजी से बढ़ा है। जब उसने यहां बच्चों को पढ़ाना शुरू किया था तब सिर्फ पांच लड़कियां स्कूल आती थीं। वहीं अब ये संख्या बढ़कर 300 हो गई है। बसंती दिन में स्कूल के बच्चों को पढ़ाती हैं और रोज शाम को बच्चों के घर जाकर उन्हें और उनके माता-पिता को पढ़ाई का महत्व बताती हैं ताकि कोई बच्चा अशिक्षित न रहे।

बसंती की पढ़ाई से प्रभावित होकर उनके पति ने भी ग्रेजुएशन किया और वे लोकल पंचायत में काम करने लगे। हकमा राम अपनी पत्नी की तारीफ करते नहीं थकते। वे कहते हैं – ”मैंने अपनी पत्नी की वजह से पढ़ाई की। आज बसंती के पढ़ाए कई स्टूडेंट अच्छी नौकरी कर रहे हैं”। लेकिन बसंती खुद 20 सालों से गांव में शिक्षा की अलख जगाने के बाद आज भी कॉन्ट्रेक्चुअल टीचर हैं जिन्हें हर महीने 8000 रुपए वेतन मिलता है।

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