4° तापमान में भी डटे किसान: रैनबसेरे में सोने के लिए कतार लगानी पड़ रही; बोले- अंदर इतना गुस्सा कि ठंडा पानी कुछ नहीं बिगाड़ सकता

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18 मिनट पहले

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दिनभर आंदोलन में व्यस्त रहे किसानों ने आसमां के नीचे ही आशियां बना रखा है। हाड़ कंपाने वाली हवा चल रही है, पर परवाह नहीं। सब एक साथ ऐसे सो रहे हैं मानों अब कोई डर नहीं। बेखौफ नींद से दिखाना चाहते हैं कि जीत तय हो चुकी है।

  • हजारों किसान सड़कों पर हाड़ जमाने वाली ठंड में रातें गुजारने को मजबूर, ठंड से हो चुकीं अब तक कई मौतें

सर्दी डरा रही है। फिर भी किसान डटा है। उसे न सरकार हिला पा रही है और न ही सर्द रातें। बुधवार शाम को संत बाबा रामसिंह की आत्महत्या के बाद किसान हिला हुआ था। किसानों के परिजन परेशान हैं, इस तरह की घटनाएं होते ही फोन करके अपनों का हालचाल जानने लगते हैं। बुधवार की इसी रात में हम भी किसानों का हालचाल जानने के लिए सड़क पर थे। 4 डिग्री तापमान और 12 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से जमा देने वाली सर्द हवाओं के थपेड़े लग रहे थे। रात 11 बजे सब काम बंद करके सोने की तैयारी में थे। खालसा एड के रैन बसेरे पहुंचे तो लंबी लाइन बाहर लगी थी। ये सब लोग यहां सोने के लिए आए थे। यहां खड़े किसान अनमोल सिंह से बात की तो बताया कि एक घंटे से लाइन में खड़ा हूं, जिससे कि सोने की जगह और कंबल मिल जाए।

अगर यह भी भर गया तो कहीं किसी की ट्राली के नीचे ही रात गुजारनी पड़ेगी। अंदर जाकर देखा तो 200 से ज्यादा किसान तो सो चुके थे। छत के नाम पर ऊपर एक टेंट था और नीचे जमीन पर चद्दर बिछी थी। शरीर ढंकने को कंबल मिले थे और सभी ने अपना सामान पॉलीथिन में रखा हुआ था। यहां लेटे किसान हरप्रीत सिंह से पूछा कि इतनी ठंड में कैसे रुके हुए हैं तो उन्होंने कहा कि हम तो फिर भी स्वर्ग में हैं, बाहर सड़क पर जाकर देखिए इस सरकार ने हमारे भाइयों को कैसे रात गुजारने को मजबूर कर रखा है। यहां से निकले तो देखा कि साइड में अभी से लोग नहा रहे थे।

फोटो दिल्ली की कुंडली बॉर्डर की है। कड़कड़ाती ठंड में किसान खुले में नहाने-धोने से लेकर नाश्ते और खाने के लिए जूझते नजर आते हैं।

फोटो दिल्ली की कुंडली बॉर्डर की है। कड़कड़ाती ठंड में किसान खुले में नहाने-धोने से लेकर नाश्ते और खाने के लिए जूझते नजर आते हैं।

उन्होंने बताया कि रात से ही नहाने के लिए नम्बर लगने लगता है, क्योंकि यहां नम्बर नहीं आया तो बाहर सड़क पर इस ठंड में बर्फ जैसे ठंडे पानी से नहाना पड़ता है। यहां से हम सड़क पर आगे की तरफ निकले तो हैरान रह गए। बुजुर्गों, महिलाओं से लेकर छोटे बच्चे सभी सड़कों पर एक कंबल के सहारे सो रहे थे। कोई ट्रैक्टर की छोटी सीट पर लेटा था तो कोई ट्रॉलियों के नीचे बिस्तर लगाकर सोने की कोशिश कर रहा था। कुछ ने ट्रॉलियों के अंदर बिस्तर लगाए थे तो कुछ ने सड़क पर ही हल्का तिरपाल लगाकर सोने की व्यवस्था की हुई थी।

एक ट्राॅली के नीचे पंजाब से आए किसान हरपाल सिंह सोने की कोशिश कर रहे थे। उनसे बात की तो बताया कि काफी देर से सोने की कोशिश कर रहा हूं लेकिन नींद नहीं आ रही। हमने कहा-सर्दी के कारण नींद नहीं आ रही क्या? तो किसान ने जवाब दिया कि जब सरकार से टक्कर ले ली तो ये सर्दी क्या चीज है। घर में पत्नी बीमार है और कोई दवाई दिलवाने वाला नहीं है। मैंने फोन पर उससे कहा था कि घर आ जाऊं, उसने जवाब दिया कि मैं चाहे मर जाऊं लेकिन बिना जीते वापस मत आना। यहां से थोड़ा आगे बढ़े तो कुछ किसान आग जलाकर बैठे थे।

दिनभर के थकाऊ आंदोलन के बाद किसानों को जहां जगह मिलती है, वहीं गद्दा बिछाकर नींद के आगोश में हो चले जाते हैं।

दिनभर के थकाऊ आंदोलन के बाद किसानों को जहां जगह मिलती है, वहीं गद्दा बिछाकर नींद के आगोश में हो चले जाते हैं।

उनसे बात की तो बताया कि ट्राॅली में आदमी ज्यादा हैं, इसलिए आधी रात तक आधे सोते हैं और उसके बाद दूसरों का नंबर आता है। तब तक बाकी के साथी आग के सहारे ही रात काटते हैं। यहां से आगे चले तो देखा कि एक किसान फोन पर बात कर रहा था और भावुक था। फोन कटने के बाद उनसे बात की तो बताया कि घर से शाम से अब तक 10 बार फोन आ लिया।

जब भी यहां कोई मरता है और खबर घर वालों को लगती है तो वो चिंता करने लगते हैं। बार-बार फोन करके पूछते हैं कि ठीक हो या नहीं। घर वालों को मेरी चिंता होती है, क्योंकि मुझे पहले हार्ट अटैक आ चुका है, दवाई चल रही है जो अब खत्म हो गई है। यहां तीन लोग हार्ट अटैक से मर भी चुके हैं इसलिए घर वाले चिंतित हैं। मंच से करीब एक किलोमीटर दूर एक पेट्रोल पंप के बाहर खुले में ठंडे पानी से नहा रहे थे। इनसे बात की तो बोले कि ठंड को ठंड काटेगी और हमारे अंदर इतना गुस्सा है कि ये ठंडा पानी कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

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