Coronavirus Vaccine: Indian firm Serum Institute bets 45 crore on Oxford vaccine, 50-50 cut up between India and the remainder of the world | पुणे के पूनावाला ने ऑक्सफोर्ड की कोरोना वैक्सीन पर लगाया 3300 करोड़ रुपए का दांव, दुनिया के आधे बच्चों को टीका लगा चुकी है भारतीय कंपनी सेरम

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5 मिनट पहले

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पुणे स्थित सेरम इंस्टीट्यूट में बायोरिएक्टर पर काम करते वैज्ञानिक। इसके अंदर कोरोनावायरस वैक्सीन की भरोसेमंद दवा है।

  • एस्ट्राजैनेका डील के तहत ऑक्सफोर्ड के साथ काम कर रही सेरम इंस्टीट्यूट, कम और मध्य इनकम वाले देशों के लिए 100 करोड़ डोज बना सकती है
  • अदार पूनावाला के मुताबिक, भारत और दुनिया के बीच बांटेंगे 50-50 के अनुपात से वैक्सीन, गरीब देशों पर ज्यादा रहेगा फोकस

जैफ्री गैटलमैन. कोरोनावायरस वैक्सीन के निर्माण को लेकर भारतीय बिजनेसमैन अदार पूनावाला बड़ा दांव लगा चुके हैं। पुणे स्थित दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन निर्माता सेरम इंस्टीट्यूट कोरोना वैक्सीन के लाखों डोज बनाने जा रही है। हालांकि, जिस वैक्सीन को सेरम इंस्टीट्यूट तैयार करने वाला है, वो अभी भी ट्रायल फेज में है। अगर यह वैक्सीन काम कर गई तो कंपनी के सीईओ पूनावाला दुनिया के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति बन जाएंगे।

ऑक्सफोर्ड के साथ काम कर रही है सेरम इंस्टीट्यूट
पूनावाला की कंपनी सेरम इंस्टीट्यूट ऑक्सफोर्ड के साथ मिलकर वैक्सीन बना रही है। कंपनी ने अप्रैल में ही क्लीनिकल ट्रायल्स खत्म होने से पहले ही बड़े स्तर पर वैक्सीन बनाने की घोषणा कर दी थी। मई की शुरुआत में यहां एक सील्ड स्टील बॉक्स में ऑक्सफोर्ड से दुनिया की सबसे भरोसेमंद वैक्सीन का सेल्युलर मटेरियल आया था।

हर मिनट तैयार होंगे 500 डोज
पूनावाला की कंपनी हर मिनट वैक्सीन के 500 डोज बनाने के लिए तैयार है। पूनावाला के पास आजकल दुनियाभर के स्वास्थ्य मंत्रियों, प्रधानमंत्रियों और तमाम प्रमुखों के फोन आ रहे हैं, जिनसे उनकी कभी बात नहीं हुई थी। पूनावाला कहते हैं कि ‘सभी मुझसे वैक्सीन के पहले बैच के लिए रिक्वेस्ट कर रहे। मैंने सभी को समझाया कि देखो मैं आपको आधी-अधूरी वैक्सीन नहीं दे सकता।”

अदार पूनावाला, सेरम कंपनी के चीफ एग्जीक्यूटिव हैं।

दुनिया के आधे बच्चों को लग चुका है सेरम की बनी वैक्सीन
कोरोनावायरस ने दुनियाभर में उथल-पुथल मचा रखी है। सारी उम्मीदें वैक्सीन पर ही टिकी हैं। ऐसे में सेरम इंस्टीट्यूट खुद को बहुत ही कॉम्पीटिटिव और धुंधले प्रयासों के बीच पाता है। वैक्सीन को जल्द से जल्द बाहर लाने के लिए डेवलपर्स का कहना है कि उन्हें सेरम के बड़े वैक्सीन असेंबली लाइन की जरूरत है। सेरम हर साल दूसरी वैक्सीन के 150 करोड़ डोज बनाती है, जो अधिकांश गरीब देशों तक जाती है। यह आंकड़ा किसी भी दूसरी कंपनी से ज्यादा है। दुनिया के आधे बच्चों को सेरम में बने टीके लगे हैं। कंपनी का पैमाना ही खासियत है।

भारत और बाकी दुनिया में बांटेंगे 50-50 वैक्सीन

  • फिलहाल यह साफ नहीं है कि सेरम की कितनी वैक्सीन भारत में रखी जाएंगी और इसके निर्माण में आए खर्च को कौन वहन करेगा। भारत में कोरोनावायरस की स्थिति भयावह हो रही है और करीब 130 करोड़ लोगों को यहां वैक्सीन की जरूरत है। वहीं, मोदी सरकार ने ड्रग्स के निर्यात पर रोक लगा दी है।
  • अदार पूनावाला का कहना है कि ‘वे बनाई जा रही लाखों वैक्सीन को भारत और बाकी दुनिया में 50-50 अनुपात में बांटेंगे। उनका खास ध्यान गरीब देशों पर होगा और इस बात से पीएम मोदी को भी कोई ऐतराज नहीं है। हालांकि सरकार किसी भी प्रकार की इमरजेंसी लगा सकती है।”

कंप्यूटर से चलने वाला कैमरा असेंबली लाइन में मौजूद हर वायल में क्रैक या दूसरी परेशानी को बारीकी से देखता है।

जब तक ट्रायल खत्म होंगे, वैक्सीन तैयार हो जाएगी
ऑक्सफोर्ड की यह वैक्सीन भरोसेमंद विकल्पों में से एक है। दुनियाभर के अलग-अलग कारखानों में इसका प्रभाव साबित होने से पहले ही बड़े स्तर पर निर्माण शुरू हो जाएगा। वैक्सीन को तैयार होने में वक्त लगता है। लाइव कल्चर्स को बायोरिएक्टर्स के अंदर बढ़ने में हफ्तों लगते हैं। उदाहरण के लिए हर वायल को ठीक तरह से साफ करना, भरना, सील और पैक करना जरूरी है।

दो प्रक्रियाओं को एकसाथ करने का कारण है कि जब वैक्सीन ट्रायल्स में है और जब तक ट्रायल्स खत्म होंगे, वैक्सीन तैयार हो जाएगी। अमेरिकी और यूरोपीय सरकारें इस प्रयास के लिए करोड़ों डॉलर खर्च करने का वादा कर चुकी हैं। इसके साथ ही जॉनसन एंड जॉनसन, फाइजर, सैनोफी और एस्ट्राजैनेका जैसे बड़े फार्म्स्यूटिकल नामों के साथ उत्पादन के लिए डील कर चुकी हैं।

सेरम के कैंपस में अदार पूनावाला ने अपने पुराने हवाई जहाज को ऑफिस सूट में बदल दिया है।

दूसरी कंपनियों से अलग है सेरम इंस्टीट्यूट

  • एस्ट्राजैनेका ऑक्सफोर्ड की पार्टनर है। इसके अलावा यूरोप, अमेरिका और दूसरे बाजारों के लिए वैक्सीन निर्माण के लिए 7400 करोड़ रुपए से ज्यादा सरकारी कॉन्ट्रैक्ट साइन कर चुकी है। हालांकि, इसने सेरम इंस्टीट्यूट को भी उत्पादन करने की इजाजत दे दी है। पूनावाला के अनुसार, फर्क यह है कि उनकी कंपनी खुद ही प्रोडक्शन का खर्च उठा रही है।
  • इसके अलावा एक खास फर्क के कारण भी सेरम इंस्टीट्यूट दूसरी कंपनियों से अलग है। दूसरे सफल भारतीय कारोबारियों की तरह यह पारिवारिक बिजनेस है। यह कंपनी तेजी से फैसले लेती है और बड़े जोखिम उठाती है। इस फैसले से कंपनी को करोड़ों डॉलर का खर्च उठाना पड़ेगा।

कंपनी का इतिहास
पूनावाला कहते हैं कि वे 70 से 80 प्रतिशत सुनिश्चित थे कि ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन काम करेगी, लेकिन मैं उम्मीद करता हूं कि हम ज्यादा गहराई में नहीं जाएंगे।

शेयर होल्डर्स को हटा दिया जाए तो सेरम इंस्टीट्यूट केवल दो लोग चलाते हैं, अदार पूनावाला और उनके पिता सायरस पूनावाला। सायरस एक हॉर्स ब्रीडर थे जो अरबपति बने। करीब 50 साल पहले सेरम इंस्टीट्यूट परिवार के घोड़ों के फार्म में एक शेड के रूप में शुरू हुई थी। बाद में सायरस को यह अहसास हुआ कि वैक्सीन लैब के लिए घोड़ों को दान करने के बजाए वे खुद भी सीरम को प्रोसेस कर सकते हैं और वैक्सीन बना सकते हैं।

2006 में मुंबई में पूनावाला स्पॉन्सर्ड रेस में सायरस पूनावाला (दाएं मध्य में), सायरस ने हॉर्स ब्रीडर के तौर पर शुरुआत की थी और बाद में अरबपति बने।

टिटनस के टीके से कंपनी की शुरुआत की थी

  • पूनावाला ने 1967 में टिटनस के टीके बनाकर कंपनी की शुरुआत की थी। इसके बाद सांप के काटने के एंटीडोट्स। फिर टीबी, हेपिटाइटिस, पोलियो और फ्लू के शॉट्स बनाए। पूनावाला ने पुणे में मौजूद घोड़ों के फार्म से बड़ा वैक्सीन साम्राज्य तैयार किया।
  • भारत के सस्ते लेबर और एडवांस टेक्नोलॉजी को मिलाकर सेरम इंस्टीट्यूट ने गरीब देशों के लिए सस्ती वैक्सीन सप्लाई करके यूनिसेफ, पैन अमेरिकन हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल कर लिए। अब पूनावाला भारत के अमीर परिवारों में से एक हैं और उनकी संपत्ति 37000 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा है।

वैज्ञानिक बायो रिएक्टर्स के वायटल संकेत को मॉनिटर कर रहे हैं

फैसिलिटी के अंदर कोरोनावायरस वैक्सीन कैंडिडेट और सफेद हुड पहने साइंटिस्ट बड़े स्टेनलेस स्टील वैट्स देख रहे हैं, जहां वैक्सीन के सेल्युलर मटेरियल को बनाया जा रहा है। साथ ही वे बायो रिएक्टर्स के वायटल संकेत को मॉनिटर कर रहे हैं। सेरम के साइंटिस्ट संतोष नरवड़े कहते हैं “यह सेल्स बेहद नाजुक हैं। हमें ऑक्सीजन स्तर और स्पीड मिक्सिंग से इनका ध्यान रखना होता है नहीं तो यह सेल्स टूट जाएंगे। हम सभी को ऐसा महसूस हो रहा है जैसे हम देश और दुनिया को समाधान दे रहे हैं।”

जुलाई की शुरुआत में सेरम इंस्टीट्यूट में हाई स्पीड वैक्सीन असेंबली को चलाते हुए टेक्नीशियन्स।

नवंबर तक 30 करोड़ डोज बनाने की तैयारी
ऑक्सफोर्ड की तैयार की हुई वैक्सीन ने दिखाया कि यह ठीक हो रहे कोविड 19 के मरीजों की तरह ही एंटीबॉडीज को एक्टिव करती है। सेरम पहले भी रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए इस वैक्सीन के लाखों डोज तैयार कर चुका है। संभावित तौर पर नवंबर तक जब ट्रायल्स पूरे होंगे, तब तक सेरम कमर्शियल उपयोग के लिए 30 करोड़ डोज का भंडार तैयार करने की तैयारी में है।

वैक्सीन असफल हो गई तो क्या?
अगर यह वैक्सीन असफल होती है तो भी सेरम इंस्टीट्यूट मददगार होगा। सेरम ने डेवलपमेंट के शुरुआती दौर में चार अन्य वैक्सीनों को निर्माण के लिए दूसरे वैक्सीन डिजाइनर के साथ हाथ मिलाया है। हालांकि अभी इनका उत्पादन नहीं किया जा रहा है। अगर यह सभी असफल होते हैं तो पूनावाला का कहना है कि वे जल्द ही अपनी असेंबली लाइन्स को दूसरी कारगर वैक्सीन के उत्पादन में लगा देंगे। बहुत की कम लोग इस कीमत, इस पैमाने और इतनी तेजी से वैक्सीन का उत्पादन कर सकते हैं।

पहली बार वे प्राइवेट इक्विटी फंड की मदद लेने के बारे में सोच रहे हैं पूनावाला

  • एस्ट्राजैनेका डील के तहत सेरम भारत और मिडिल और लो इनकम देशों को लिए ऑक्सफोर्ड वैक्सीन के 100 करोड़ डोज बना सकता है। इसके अलावा इतनी कीमत वसूली जा सकती है जो इसके प्रोडक्शन से ज्यादा नहीं है।
  • महामारी के बाद पूनावाला को उम्मीद है कि वो वैक्सीन को प्रॉफिट पर बेच पाएंगे। इस दौरान उनकी सबसे बड़ी चिंता है नगदी। उन्होंने अनुमान लगाया है कि बड़े स्तर पर ऑक्सफोर्ड वैक्सीन के उत्पादन के लिए वे करीब 3300 करोड़ रुपए खर्च कर रहे हैं।
  • इस दौरान उनके कई खर्चों की पूर्ति कभी नहीं हो सकती। जैसे वैक्सीन को रखने के लिए वायल्स और प्रोसेस में इस्तेमाल होने वाला कैमिकल। पूनावाला का कहना है कि पहली बार वे प्राइवेट इक्विटी फंड की मदद लेने के बारे में सोच रहे हैं।

प्रोडक्शन प्रोसेस की आखिरी प्रक्रिया: सील्ड वैक्सीन को कार्डबोर्ड के बॉक्सेज में रखना होता है।

  • इसके उलट देखा जाए तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की वॉर्प स्पीड प्रोजेक्ट और ऐसी ही यूरोप की योजना के तहत तैयार हुई डील हैं। अपने लोगों के लिए लाखों डोज सुरक्षित करने के लिए अमीर देश पहले ही ड्रग कंपनियों को ऐसी वैक्सीन के मास प्रोडक्शन से जोखिम हटाने के लिए पैसे दे चुके हैं या चुकाने का वादा कर चुके हैं, जो शायद काम ही न करें और आखिर बाहर फेंक दी जाएं।
  • लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में हेल्थ पॉलिसी प्रोफेसर डॉक्टर ओलिवियर वाउटर्स कहते हैं कि यह वैक्सीन राष्ट्रवाद को बताता है। अमीर देश लाइन में आगे जा रहे हैं और गरीब देश पीछे छूटने के जोखिम में हैं।
  • एनालिस्ट्स ने कहा है कि सेरम को बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन या शायद भारत सरकार से आर्थिक मदद मिलने की संभावना है। हालांकि दोनों ने इस पर प्रतिक्रिया देने से मना कर दिया है। कम से कम ऑक्सफोर्ड वैक्सीन के मामले में सेरम का काम केवल प्रोडक्शन है।

सेरम कंपनी में जर्मन कंपनी के टेक्नीशियन्स नई हाई स्पीड वैक्सीन असेंबली को इंस्टॉल करते हुए।

अदार के सीईओ बनने के बाद बढ़ा है कंपनी का रेवेन्यू
जब से अदार पूनावाला ने सेरम के सीईओ का पद संभाला है, तब से कंपनी नए बाजारों में फैली है। इससे कंपनी का रेवेन्यू 5900 करोड़ रुपए से ज्यादा हो गया है। अदार कहते हैं कि ‘उनके परिवार को जीवन बचाने की वैक्सीन बनाने के बजाए फैंसी कार या जेट में घूमने के लिए जाना जाता है। भारत में कई लोगों को यह नहीं पता कि मैं क्या करता हूं। उन्हें लगता है कि अरे तुम घोड़ों के साथ कुछ करते हो और जरूर पैसे बना रहे हो।’

सेरम इंस्टीट्यूट पर नया कंस्ट्रक्शन हो रहा है। कंपनी ज्यादा वैक्सीन बनाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश कर रही है।

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